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ग्रीस का आर्थिक संकट

08 Jul 15
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Published in Economy

वर्ष 2000 से 2007 तक ग्रीस की अर्थव्यवस्था 5 से 5.5 की दर के साथ यूरोप की एक सबसे तेज बढने वाली अर्थव्यवस्थाओं मे से एक थी। इसके बावजुद 2009 तक ग्रीस दिवालिया हो चुका था, जब इसका बजट घाटा 10 प्रतिशत पहुंच गया था।

ऐसा इसलिये हुआ क्योंकी ग्रीस की जीडीपी मे 80न प्रतिशत योगदान उन सेवाओं का है जो कि पर्यटन, शिपिंग तथा सरकारी नौकरियों से सम्बद्द है। 2007-08 की मन्दी से पर्यटन सेक्टर सबसे पहले प्रभावित हुआ, इस तरह ग्रीस की अर्थव्यवस्था की मानो जमीन ही ढह गई। स्पेन और इटली भी इससे बहुत प्रभावित हुये थे। इस तरह की समस्या का समाधान कोई भी अर्थव्यवस्था अपनी मुद्रा का अवमुल्यन करके ही निकाला करती हैं। मुद्रा का अवमुल्यन कर वो अपने को प्रतिस्पर्धा मे बनाये रखती हैं। लेकिन यूरो प्रणाली मे ग्रीस के पास यह विकल्प भी नही था इसलिये उन्होने बेलाआउट से पोषित अत्यधिक घाटे की अर्थव्यवस्था को चुना। पर यह दिर्घकालिक हल नही हो सकता, जब तक कि वे अर्थव्यवस्था मे संरचनात्मक सुधार और खर्च मे कटौती को नही अपनायें।

वर्ष 1992 की मास्ट्रिक्ट संधि के अनुसार यूरोपियन युनियन-15 का विस्तार यूरोपियन युनियन-27 के रूप मे होना था, जिससे सोवियत संघ के पतन के बाद पूर्व की दिशा मे सुरक्षा के मोर्चे पर विस्तार किया जा सके। इस तरह यूरोपियन युनियन-27 बुनियादी रूप से एक राजनितिक निर्णय था। इसके साथ एक सामान्य मुद्रा (तथा राजस्व घाटा) को अपनाने का आशय था कि एक आर्थिक उपकरण (मुद्रा) का इस्तेमाल राजनितिक लक्ष्य (यूरोपियन युनियन-27) को सहारा देने के लिये किया जा रहा था जब तक कि यूरोपियन युनियन एक सांस्कृतिक इकाई नही बन जाता। 1 करोड 10 लाख की आबादी वाला ग्रीस जिसकी जीडीपी का आकार यूरोप की जीडीपी का 2 प्रतिशत से भी कम है, के यूरोपियन युनियन से बाहर होने पर 15 साल पुराना ढांचा ढह सकता है ?

ग्रीस ने 2010 मे दिवालिया होने के लिये आवेदन किया था। तब तक ग्रीस के ऋण और जीडीपी का अनुपात 146 हो चुका था जो कि अब बढ कर 180 प्रतिशत हो गया है। इसके बाद ग्रीस को क्रमश: 110 तथा 130 बिलियन यूरो के बेलआउट पैकेज दिये गये, जिसके माध्यम से बैंको मे पूंजी प्रवाह भी बढाया गया था। इसके साथ यह भी तय हुआ था कि ग्रीस अपने खर्चों मे कटौती करेगा, संरचनात्मक सुधार लायेगा और सार्वजनिक संपत्तियों का निजिकरण करेगा। 2014 तक कई समीक्षाओं मे यह स्पष्ट हो गया था कि ग्रीस अपनी वचनबद्धताओं से मुकर रहा है।

61.31 से अधिक मतदाताओं ने जनमतसंग्रह मे साफ बता दिया है कि वे उन पर थोपे जाने वाले कडे उपायों को स्वीकार नही करेंगे। जहां तक प्रधानमंत्री सिप्रास का यह कहना कि वे तीसरे सहायता पैकेज के लिये जनमतसंग्रह के आधार पर यूरोपियन संघ से बात करेंगे, इसका अर्थ यही है कि वे यूरोजोन से अलग होने के पक्ष मे नही हैं। अब यूरोपियन संघ को बाध्य हो कर इस कडे उपायों को ढीला करने पर बात करनी होगी। ग्रीस 20 वर्ष तक पुनर्भुगतान करना चाहता है, लेकिन इसका असर पुर्तगाल, स्पेन, इटली पर भी पड सकता है जो आर्थिक संकट से जुझ रहे हैं। अगला संकट 20 जुलाई को सामने आ सकता है जब यूरोपियन सेंट्रल बैंक को 3.5 अरब यूरो बॉण्ड चुकाने का समय आयेगा। इन हालातों के बीच यह सम्भावना कम ही नजर आ रही है कि इस तिथि से पूर्व बेहतर समाधान खोज पाने मे ग्रीस सरकार सफल हो पायेगी। यदि समस्या का समाधान अगले कुछ दिनों मे नही निकाला जाता है तो सम्भव है कि ग्रीस बैक धराशाई हो जायेंगे।

यूरोजोन से अलग होकर ग्रीस के आर्थिक संकट से निकलने की संभावना अधिक है क्योंकी वह स्वतंत्र मौद्रिक निति बना सकेगा। इसके बाद वह अपनी पुरानी मुद्रा छाप सकेगा और उसका अवमुल्यन भी कर सकेगा। यूरोजोन मे रहते हुये स्वतंत्र मौद्रिक निति नही बना सकता, मुद्रा नही छाप सकता और सबसे बडी बात ग्रीस की विनिमय दर समान ही रहती है। यूरोजोन से हटने पर शुरुआती दौर मे घाटे मे जरुर रहेगा लेकिन घाटे की स्थिति से उबर आयेगा।

 

 

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