ShankhNaad

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The Islamic ‘Holy Month’of Ramzan (pronounced ‘Ramadan’ nowadays to sound more Arabic, hence Wahhabi, and hence ‘Secular’) has officially begun, and the Facebook and Twitter timelines all around seem to be busy expressing best wishes to the Muslim and Non-Muslim friends alike.

इस्लामी 'पवित्र रमजान' (आजकल के हिसाब से 'रमदान' जो अधिक अरबी इसलिए अधिक वहाबी, और इसलिए सुनने में अधिक सेक्युलर है) का महीना आधिकारिक तौर पर शुरू हो गया है, और फेसबुक और ट्विटर पर चारों ओर मुस्लिमों और ग़ैर-मुस्लिमों के लिए शुभकामनाएं देखने को मिल रही हैं।

Kairana, a small town situated in the Shamli district of Western Uttar Pradesh has been creating ripples for a few days in the past.

It was one among the last days of the month of September, 2015 when an incident took place in the dirty lanes of a West U.P. village that was relentlessly screamed to be the ‘most barbaric, savagely, inhuman, monstrous and anti-human hate crime’ committed in the land of India after the 2002 Gujrat riots.

लीज़ा हेडन, वह प्रसिद्ध मॉडल-अभिनेत्री जिन्होंने 'शौकीन्स' फ़िल्म के साथ अपनी फ़िल्मी पारी की शुरुआत की और समीक्षकों द्वारा प्रशंसित 'क्वीन' में जिन्हें अपने उम्दा अभिनय के लिए सराहा गया है, अभी हाल ही में काफ़ी सुर्खियों में रहीं। इस मामले में विशेष रूप से आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि स्वयं को ज़ोरशोर से महिला अधिकारों के ठेकेदार बताने वाली वामपंथी-उदारवादी नारीवादी जमात द्वारा सोशियल मीडिया पर लीज़ा हेडन को 'प्रतिगामी', 'निराशाजनक' और 'देहाती जाहिल' कहने की हद तक आलोचना की जा रही थी।

Lisa Haydon recently made it to headlines a few days back. What was particularly astonishing about it was the fact that she was being severely criticized by the Left-Liberal Feminist brigade, some of whom went to the extent of calling her ‘regressive’, ‘disappointing’ and ‘village idiot’ upon their social media timelines.

शैक्षणिक संस्थान वे स्थान हैं पर जहां एक राष्ट्र के भविष्य की पीढ़ियों को तैयार किया जाता है। इस तेज़ी से बदलती दुनिया के बारे में नए विचारों, मुद्दों और जिन चुनौतियों का इस सामना करना पड़ रहा है, उनका सामना करने के लिए जहाँ विचार-विमर्श किया जाता है, और कई स्तरों पर उन प्रयासों की तलाश की जाती है जिन से हम सामूहिक रूप से इस दुनिया को रहने के लिए एक बेहतर जगह बना सकते हैं।

Academic institutions are the places where future generations of a nation are groomed. Where new ideas about the ever changing world, the issues and challenges it is facing or going to face are discussed and efforts on multiple levels are thought upon, so that collectively we can make this world a better place to live in.

यह हम सभी के द्वारा जाना जाता एक स्थापित तथ्य है कि सौंदर्य की अभिव्यक्ति और बौद्धिक बहस की लगभग सभी धाराओं जैसे शिक्षा, पत्रकारिता, साहित्य, ललित कला, रंगमंच और सिनेमा आदि पर वामपंथियों द्वारा आजादी के बाद के दिनों से ही पूरी तरह कब्जा कर लिया गया. सिनेमा एक बहुत शक्तिशाली दृश्य-श्रव्य माध्यम है जो आम जनता और विशेष रूप से युवाओं को अत्यधिक तीक्ष्णता से प्रभावित करता है

The fact that almost all the streams of aesthetic expression and intellectual discourse such as academics, journalism, literature, fine arts, theater and cinema etc. have in a way been captured by the leftists right since the days of independence is known to all of us.

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