गौमांस निषेध एवं सेकुलर सोच

04 Mar 15
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Published in Spirituality

पिछले वर्ष उच्चतम न्यायलय ने तमिल नाडू के जलिकुट्टू उत्सव पे पशु क्रूरता के नाम पे निषेध लगा दिया था ।

 

तमिलनाडु में घर में बैल होना गौरव का विषय होता है, उसे पूजा भी जाता है| जलिकुट्टू का उत्सव वर्ष का समय होता है जब किसान खेती -बाड़ी कटाई आदि से निवृत्त होकर अपने पशुओं के साथ एक अछे वर्ष के अंत का उत्सव मनाते हैं । यह किसानों का सदियों पुराना उत्सव है एवं इसका सीधा सम्बन्ध भारतीय संस्कृति एवं धार्मिक आस्थाओं से है । ऐसे में कुछ अपवाद जरूर होते हैं लेकिन उन्हें ही सत्य बना कर दिखने के कारण पशु क्रूरता का हवाला देकर इस उत्सव को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया है । किसी किसान से यह पूछने का प्रयास नहीं किया गया की क्यों वह जान बूझ के अपने ही बैलों के साथ क्रूरता पूर्ण व्यवहार करेंगे - किसी एन जी ओ ने कह दिया और कोर्ट को मानना पड़ा ।

इस बात का एक और पहलु यह था की बैलों का हिन्दू संस्कृति में महत्व देखते हुए एवं इस उत्सव को हिन्दू संस्कृति का अंश मानते हुए इस विषय पे काफी हल्ला मचाया गया - प्रयास यह था की हिन्दुओं को क्रूर एवं पिछड़ी मानसिकता वाला दिखाया जा सके । इस उत्सव का विरोध करने वाले स्वयं को धर्मनिरपेक्ष बताते गर्व से फूले नहीं समाते ।

अब ऐसे में इन्ही छद्म - धर्मनिरपेक्षता का एक उदहारण देखने को मिला महाराष्ट्र में पास हुए एक बिल द्वारा । यह बिल था महाराष्ट्र में गौमांस पे निषेध का । आने वाले नियम के अनुसार, अब महाराष्ट्र में गौमांस रखना अथवा बेचना निषेध है । दोषी को 5 साल कारावास अथवा १०,००० का जुर्माना है । अब एक संतुलित मानसिकता का मनुष्य यही अपेक्षा करेगा की जिन्होंने बैलों की दौड़ का विरोध किया है वो बैलों की हत्या बंद करने वाले नियम का पूर्ण समर्थन करेंगे ।।

लेकिन यह क्या ? जैसे ही यह समाचार आया, इन छद्म धर्मनिरपेक्षों में क्रोध की लहर मच गयी । कहा जाने लगा की "यह तो सरासर हमपर अत्याचार है हम क्या खाएं क्या नहीं खाए यव बताने वाली सरकार कौन होती है ? मुझे गौमांस प्रिय है, तो मैं क्यों न खाऊं ?"

आश्चर्यचकित रह गए ? स्वागत है आपका भारत में - यहाँ धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है जो हिन्दू करना चाहे , जो उसकी संस्कृति कहे - उसके विपरीत चलना । यहाँ आपको अपने मस्तिष्क के प्रयोग की कतई आवश्यकता नहीं है - मात्र सनातन संस्कृति का विरोध करें , गौमांस निषेध को फासीवादी फरमान करार दें और अपने 'पशु क्रूरता' वाले तर्क को चूल्हे में डाल दें। किसी ने यह नहीं कहा की "भले ही हिन्दू सस्कृति के सम्मान में यह नियम लाया गया लेकिन मैं इसका समर्थन करता हूँ क्योंकि मैं पशु क्रूरता के विरुद्ध हूँ "

लोगों ने यह भी तर्क दिया की यह हमारे अधिकारों का हनन है ।

अब जरा कल्पना करें की तमिलनाडु के किसानों ने यदि यह कहा होता की "जलिकुट्टू हमारा अधिकार है " तो इन्ही छद्म धर्मनिरपेक्षों ने कैसी मोमबत्ती मार्च निकाले होते, टीवी स्टूडियो में भारतीय संस्कृति का कैसे मखौल उड़ाया होता । लेकिन येही तो बात है - हिन्दू संस्कृति की बात सही ढंग से रखने वाले कम हैं, हल्ला मचाने वाले भाषण देने वाले कहीं ज्यादा ।

 

हालाँकि गौमांस निषेध के विषय पे कई बातें रखी जा सकती हैं, किन्तु एक बात तो निश्चित है की जबतक देश में छद्म धर्मनिरपेक्षता रहेगी, कुतर्क का बोलबाला रहेगा ।

1 comment

  • Comment Link Ann Saturday, 24 December 2016 06:48 posted by Ann

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