सेकुलर विषबेल और राष्ट्रवादी शर्मनाक मौन....2

05 Jul 16
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Published in Daily Fix

रमज़ान के इस पाक और मुकद्दस महीने में बांगलादेश में जहन्नुम पहुंचा दिए गए काफिरों पर लानत भेजते हुए फिर से दोहराता हूं कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता।
अथ सेकुलर कथा

तो, जैसा कि हमेंं बताया जाता है कि अकबर जी महान थे, धर्मनिरपेक्ष थे, दीन-ए-इलाही जैसा प्रगतिशील और ऐतिहासिक काम उन्होंने किया था। उनके बारे में कुछ चीज़ें बहुत दबा-छिपा कर बतायी जाती हैं। जैसे, उन्होंने अपने संरक्षक और मौसा भी बैरम खां को किस तरह इज्जत बख्शी थी और उन्हें हज पर जाने को विवश कर दिया था।
हज पर जाते वक्त कुछ 'काफिरों' ने बैरम खां का कत्ल कर दिया और उनकी विधवा सुल्ताना बेगम को अकबर ने अहमबदाबाद से दिल्ली बुलवा लिया। उनकी बुरी हालत देखकर ही अकबर के दिल में जलजला सा आया और उन्होंने उनसे निकाह भी कर लिया। इन्हीं बैरम खां के सुपुत्र थे- अब्दुर्रहीम खानखाना, खैर, उनकी कहानी फिर कभी।
तो, जो अकबर बादशाह थे, वह थे तो पक्के मोहम्मडन। साथ में उनके मौलवी-आलिम भी थे ही, कान भरने को। सो, फरमान निकाल दिया, अकबर ने कि दरबार में कोई भी तिलक (यानी टीका) लगाकर नहीं आएगा। जो भी आएगा, उसका ललाट तप्त लोहे से दाग दिया जाएगा।
अगले दिन दरबार लगा। दरबार में मधुकर शाह ( बुंदेले थे औऱ शायद जुझारसिंह के बड़े भाई, जो वीर हरदौल के अग्रज थे) भी हाज़िर हुए और बाक़ी दिनों से बड़ा टीका लगाए हुए। पहले तो छोटा सा तिलक करते थे, आज पूरा त्रिपुंड ही बना हुआ था। (बाकी हिंदुओं ने तो पोंछ लिया था, मानसिंह जैसे लगाते ही नहीं थे)।
अकबर की नज़रें टेढ़ी हुईं, उसने मधुकरशाह से पूछा कि ये कैसी बदतमीजी थी? मधुकर शाह ने जवाब दिया- 'आपकी सुन्नत हुई है, बादशाह! वह आपका धर्म है। किसी के कहने से आप छोड़ेगे? उसी तरह तिलक मेरा धर्म है और मैं भी इसे नहीं छोड़ूंगा।'
अकबर मोहम्मडन तो कट्टर थे, लेकिन साथ ही एक नंबर के चालाक और काइंया भी। तुरंत पैंतरा बदलते हुए उन्होंने कहा, 'वाह, मधुकरशाह वाह..। यह तो आपकी परीक्षा थी। आप सफल रहे, आज से यह तिलक जो आपने लगाया है, मधुकरशाही टीका के नाम से जाना जाएगा।'

कहानी की शिक्षा यह थी कि निर्वीर्य, कायर और अपनी परंपराओं पर लज्जित हिंदू मानसिंह अगर शताब्दियों से मौजदू हैं, तो अपने धर्म पर निछावर होने को तैयार मधुकर शाह भी हमेशा हमारे पास हैं, जिनके नाम पर तिलक/टीके का एक प्रकार ही निकल गया। समय कहीं बदला नहीं है, बस उसकी गति बदली हैै।

 (साभार व्यालोक पाठक) 
 
 

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