×

Warning

JUser: :_load: Unable to load user with ID: 342

JUser: :_load: Unable to load user with ID: 7491

धर्मान्तरण

08 Jan 15
Written by
Published in Social Harmony

स्वर्गलोक में एक आदर्श गाँव था ,गाँव तो वैसे कई थे मगर उन सभी में आदर्श यही था वहां के लोग सूखपूर्वक रहते थे

अचानक एक दिन वहां एक व्यापारी आया और उसने देखा कि गाँव के बच्चे जिसे पीतल के खिल्लौने समझकर जिससे खेल रहे है वो असली सोने से बने हुए है उसने लोगों को बहला फुसलाकर सस्ते दामों में या कोई खुबसूरत सी वस्तु देकर ,उनसे वो सारे खिल्लौने खरीद लिए जब गाँव के लोगों को असलियत का पता चला तो उन्होंने राजदरबार में जाकर राजा से गुहार लगाईं कि उनके साथ न्याय किया जाए ! राजा ने  तुरंत अपने सैनिकों को भेजकर धूर्त उक्त व्यापारी को बुलाया और उससे पूंछा - अरे दुष्ट तूने इन भोले भाले ग्रामवासियों को भारतीय मतदाता  समझकर जो चुना लगाया है उसकी कलई खुल चुकी है फ़ौरन औने पौने दामों पे खरीदा गयी इनकी वस्तुएं वापस करों अन्यथा तुम्हारे खिलाफ़ राजद्रोह का मुकदमा चालाया जाएगा ! 
 

इतना सुनते ही व्यापारी की आँखों के सामने अँधेरा छा गया ,वो दुखी मन से अपने घर की ओर चल दिया !कि अगर यहीं काम उसने भारत जैसे देश में किया होता तो भावनाओं में बहकर न्यायाधीश एक पल में इतना बड़ा फैसला कदाचित नहीं करते ,पहले मेरे खिलाफ़ एफ़.आई.आर. होती ,आठ दस दिन उसमे निकल जाते ,फिर मेरे ख़िलाफ़ मुकदमा चलाया जाता ,दस बारह साल में उसका परिणाम आता ,अगर हार जाता तो पुन: याचिका दायर कर उच्चन्यायालय में मुकदमा लड़ता ,जब मुक़दमे के दौरान आधे 
से अधिक गवाह स्वत: ही स्वर्गारोहण कर चुके होते ,कुछ को औने-पौने दामों पर मै खरीद लेता ,जैसे खिल्लौने खरीदे थे पर क्या कर सकता था बेचारा 
म्रत्युलोक जैसा सुख स्वर्ग में कदाचित नसीब नहीं हो सकता है !!

जब वो घर पहुंचा तो सभी घर वालों ने उसको दुखी देखकर उसकी उदासी का कारण पूंछा - व्यापारी ने पूरी आप बीती बताई ,पूरी बात को सुनकर व्यापारी का पिता ठहाके लगाकर जोर जोर से हंसने लगा ,जब व्यापारी ने अपने पिता से इसका कारण पूंछा तो उसने कहा -पुत्र तुम राजा साहब समेत तमाम राजदरबारियों को अपने यहाँ भोजन पर बुलाओ ,शेष काम मै खुद ही पूरा कर दूंगा !

व्यापारी ने ऐसा ही किया राजा ने सहर्ष ही उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया ,और वैसे भी तानाशाह राजा हो ,भारतीय नेता हो या कोई सरकारी कर्मचारी तीनों को ही खाली फ़ोकट की मेहमाननवाजी करवाने का बहुत शौक है ! अत: तय की गयी तिथि पर सारे अतिथि पधारे !! योजनाबद्ध तरीके से राजा साहब को स्वर्ण पात्र में भोजन परोसा गया पर पीने के लिए जल की कोई व्यवस्था दिखाई नहीं दे रही थी ! सभी दरबारियों के साथ 

राजा साहब ने ज्यों ही भोजन का पहला निवाला मुहं में डाला तो उनको घनघोर पीड़ा हुयी ,भोजन बहुत अधिक तीखा था ! जब पीने के लिए राजा साहब को कहीं पानी भी दिखाई नहीं दिया तो उनको पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया !राजा भड़कते हुए बोले रे मुर्ख ! तूने मेरा अपमान किया है अब तु म्रत्युदण्ड के लिए तैयार हो जाओं 

इतना सुनते ही चारों तरफ सन्नाटा छा गया अचानक ज़ोरों के ठहाके लगाता हुआ ,व्यापारी का पिता ताम्रपात्र में पानी लेकर वहां आया आया और हाथ जोड़कर बोला महाराज ! मेरे घर में स्वर्णकलश नहीं था इसलिए आपकी शान में ये गुस्ताखी हो गयी ! 

महाराज क्रोधित होकर बोले - अरे मुर्ख जिसे प्यास बुझानी हो उसके लिए तो पानी का महत्व होता है ना की उस पात्र की सुन्दरता का !!

 व्यापारी का पिता मुस्कुराते हुए बोला - आपने बिलकुल नीति धर्म और न्याय की बात की है जिस प्रकार केजरीवाल जी को कुर्सी मिल गयी तो भी उनकी धरने की प्रवृति नहीं गयी और वो धरने पर बैठ गए क्योंकि महाराज ! जिसे रायता ही फ़ैलाना हो उस के लिए राजघाट क्या और गंगाघाट क्या ! 

राजा अपना सिर धुनते हुए बोले ! मुझे उतनी देर से राहुल गांधी क्यों बना रहे हो सीधे सीधे मुद्दे की बात पे आओं ! व्यापारी के पिता ने अपनी चालों  को कामयाब होता देखकर मन ही मन खुश होते हुए कहा महाराज ! अगर बच्चों को उन खिल्लौने से खेलना ही था तो क्या फ़र्क पड़ता है कि खिल्लौने सोने से बने या पीतल से ! काम तो वो खेलने के आ रहे थे सोने की जो गुण है जब तक उनकी जानकारी ना हो तब तक वो सोना पीतल ही है अत: सारा दोष मेरे पुत्र का ही नहीं है गाँव वाली अपनी अज्ञानता के लिए भी बराबर के जिम्मेदार है ! 

महामहिम एक सार्थक कानून भी बनाया जाए जिससे कि भविष्य में कभी भी कोई व्यापारी इन भोले भाले लोगों को बेवकूफ़ ना बना सके !राजा को सुझाव अच्छा लगा किन्तु मंत्री समेत तमाम दरबारियों को ये बात हजम नहीं हुयी क्योंकि बेवकूफ़ बनाने की तमाम डिग्रियां और लाइसेंस तो वही इन व्यापारी को मुहैया कराते थे ,उनका अपना कारोबार चौपट होता दिखाई पड़ा ,अत: वो सभी एक साथ मिलकर सुनियोजित तरीके से राजा के खिलाफ़ दुष्प्रचार करने लगे ,और राज्य के विकास से जुड़े तमाम कम-काजों में विघ्न डालने लगे !!
  
भारत में धर्मांतरण पर हो रही सियासत बिलकुल उपरोक्त कहानी के जैसी है जब लोगों को धर्म के विषय में जानकारी ही नहीं है ,उन्हें उस चीज की अहमियत नहीं मालूम तो वो थोड़े से लालच में आकर उसका सौदा कर देते है ,लोग बेचते वही वस्तु है जो कि या तो उनके उपयोग की नहीं है या  फिर वो उसके उपयोग को जानते नहीं है ,या वो उनको प्रयोग कर पाने की स्थित में नहीं है अर्थात लोगों से धर्मांतरण कराने का नहीं अपितु  धर्मजागरण कराने का समय है क्योंकि लोग लोग धर्म को तो मानते है मगर धर्म की नहीं मानते ,अर्थात धर्मानुसार आचरण नहीं करते !

पर समस्या तो ये है कि धर्मजागरण करेगा कौन ??अक्सरकर शाम को समाचारों में धर्मांतरण के मुद्दे पर होने वाली बहसों में स्वघोषित बुद्धजीवियों को धर्म के विषय में भाषण सुनकर ऐसा प्रतीत होता है कि दिन में चार बार खाने वाले शाम को भूख पर दिनभर का अपना

अनुभव बयान करें ! कुछ लोग महज ये बताने के लिए कि वो भी समाजसुधारक है जो देश के लिए चिंतन करते है भले ही इसकी आड़ में वो लाखों करोड़ों रुपये कमा रहे है ,धर्म के नाम पर उपदेश देते हुए उन लोगों को भी देखा है जिनका धर्म या तो स्विसबैंक में गिरवीं पड़ा है या कही किसी वेश्या के कोठें की धूल फांक रहा है क्यों नहीं हिम्मत करके एक बार ये अपने गिरेबान में झांकर देखें और पूंछे उस अंतरात्मा से जिसको अपने स्वार्थ की खातिर कई बार बेंचा है इनको अपने धर्म की याद एक दफ़ा क्यों नहीं आती !

जब पूर्वोत्तर भारत में एक धर्म विशेष के लोग गरीब-बेसहारा लोगों का धर्मांतरण करा रहे थे तब विरोध के ये स्वर क्यों सुनाई नहीं  दिए ,सभी लोग अपने कानों में उंगुली डालकर ,आँखों पे सेक्युलरिज्म की पट्टी बांधकर "हो रहा भारत निर्माण " के नगमे गा रहा था ,फिर क्यों आज  अचानक इतनी हाय तौबा मचाई जा रही है ,आप भी अच्छी तरह से जानते है और हम भी क्योंकि साहब यहाँ धर्म के नाम पर सिर्फ सियासत होती है , सच्चाई सब जानते है मगर जिस सच्चाई से घर ही ना चल  पाए वो सच्चाई किस काम की !

मेरी उल्टी खोपड़ी में सवाल आता है कि जब एक धर्म विशेष के लोग ,एक रूपता चाहनेवाले लोग जिहाद के नाम पर ,लोगों को मार सकते है एक नेता ,अमीर उद्योगपति ग़रीब के हिस्से की रोटी को खा जाते है ,डाक्टर अपनी तनख्वाह बढ़ाने के लिए हड़ताल कर कई इंसानों को  वक़्त से पहले मार देते है ,टीचर का मन बच्चों को पढ़ाने में बिलकुल भी नहीं लगता है ,वोटों की राजनीति के कारण  जाति-पंथ-प्रांत के नाम पर बंटवारा किया जा रहा है ,क्यों ना इन सब लोगों का धर्म परिवर्तन  करा देना चाहिए !!  इसमें अनुचित क्या है ???  सिर्फ यही ना कि ये घटना ना तो मीडिया की टी.आर.पी.बढ़ा पाएगी और ना ही हशियें पे पड़े 
राजनैतिक दलों की राजनीति चमका पाएगी !

तो लगे रही धर्मांतरण और सेक्युलरिज्म जैसे मुद्दों के पीछे और खींचते रहिये एक दूसरे की टांग ,"खुद तो आगे बढ़ नहीं पाए तो क्यों करें हम गम 
अपनों को भी तो आगे हमने हरगिज निकलने नहीं दिया "

Leave a comment

Make sure you enter the (*) required information where indicated. HTML code is not allowed.