जागो भारतीयों, तुम्हारे प्रमुख विश्वविद्यालयों के कई 'प्रख्यात शिक्षक' वास्तव में नक्सली आतंकवादी हैं!

22 May 16
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Published in National Security

शैक्षणिक संस्थान वे स्थान हैं पर जहां एक राष्ट्र के भविष्य की पीढ़ियों को तैयार किया जाता है। इस तेज़ी से बदलती दुनिया के बारे में नए विचारों, मुद्दों और जिन चुनौतियों का इस सामना करना पड़ रहा है, उनका सामना करने के लिए जहाँ विचार-विमर्श किया जाता है, और कई स्तरों पर उन प्रयासों की तलाश की जाती है जिन से हम सामूहिक रूप से इस दुनिया को रहने के लिए एक बेहतर जगह बना सकते हैं।

लेकिन आपको कैसा लगेगा अगर आपको बताया जाए कि जिन विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में आप या आपके परिजन या बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, वास्तव में वे वाम प्रेरित अराजकतावादी आतंकवाद के वैचारिक अड्डे बन गए हैं, जहां 'प्रख्यात' शिक्षक और प्रोफेसर राष्ट्र विरोधी संस्थाओं और उनके विदेशी स्वामियों के लिए हमारे युवाओं के उज्ज्वल मन को अपवित्र करने के एक एजेंडे के लिए काम कर रहे हैं ? हाल ही में एक घटना इशारा करती है कि चीज़ें इस से भी बदतर हैं।

छिटपुट मीडिया रिपोर्टों के अनुसार हाल ही में प्रकाश में आया था कि देश में नक्सली आतंकवाद के मूल केंद्र माने जाने वाले छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के अंदर स्थित तीन गांवों से संबंधित दो दर्जन से अधिक निवासी कुछ दिन पहले इकट्ठे होकर स्थानीय दरभा पुलिस स्टेशन गए और वहां शिकायत की कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ शिक्षकों ने 12 और 16 मई, 2016 के बीच अपने साथियों के साथ उनके गांवों का दौरा किया, और इस दौरान उन्हें न केवल भारत सरकार के खिलाफ विद्रोह करने के लिए उन्हें उकसाया, बल्कि यह धमकी भी दी कि अगर वे साथ नक्सली आतंकवादियों की इच्छा के आगे नहीं झुकते हैं तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने को तैयार रहना चाहिए.
यह शिक्षक थे अर्चना प्रसाद, जो जेएनयू में प्रोफेसर हैं; ऋचा केशव, दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर तथा जोशी अनुसंधान संस्थान के साथ जुड़े हुए विनीत तिवारी। एक बात जो इन चीजों को यहीं संदिग्ध बनती है वह यह है कि 'ऋचा केशव' एक नकली नाम है, उस प्रोफेसर का असली नाम नंदिनी सुंदर है, अब यह आप कल्पना ही कर सकते हैं की क्यों और कैसे एक प्रोफेसर जो एक प्रतिष्ठित संस्थान के साथ जुड़ी है, अपनी असली पहचान छुपा कर एक झूठे नाम के साथ एक सुदूर इलाके में जाती है जो देश में सबसे खतरनाक क्षेत्र माना जाता है नक्सली आतंकवाद के मामले में. इन तीनों के साथ संजय पराते नाम का शख्स भी था जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी छत्तीसगढ़ का राज्य सचिव है।
कुमाकोलेंग, नाम और सौतनार गांवों के इन निवासियों पुलिस को बताया कि यह सभी प्रोफेसर, 'नक्सली आतंकवाद को रोकने के मद्देनजर निर्दोष आदिवासियों पर भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा ढहाए जा रहे अमानवीय अत्याचारों का आकलन' करने के बहाने से इन गांवों का दौरा कर रहे थे। काफ़ी 'वेटिकनी' मामला लगता है, है न?
जब यह मामला भाजपा के नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ सरकार में गृह मंत्री राम सेवक पैकरा के संज्ञान में लाया गया, उन्होंने तुरंत आधिकारिक सूत्रों के माध्यम से इसके बारे में पूछा, और इन प्रोफेसरों को 'राष्ट्र विरोधी' बता दिया, जिसके बाद इस मामले में तेज़ी से पुलिस जांच का निर्देश दिया गया और फिर इन सभी तीन 'प्रख्यात' प्रोफेसरों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।
अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्या किया होगा इन 'नक्सली बौद्धिक आतंकवादियों' ने उन गांवों में कि पुलिस ने इनके ख़िलाफ़ औपचारिक रूप से मुक़दमा दर्ज कर लिया? पुलिस स्टेशन को ग्रामीणों द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी पर यकीन किया जाए, (जिसकी एक प्रति आप यहीं देख सकते हैं), तो इन तीन 'प्रख्यात प्रोफेसरों' ने भारतीय सरकार के खिलाफ विद्रोह करने के लिए इन तीन गांवों के निवासियों को न सिर्फ़ उकसाया बल्कि नक्सली आतंकवादियों कर समर्थन न करने की स्थिति में उन्हें अपना जीवन खोने की धमकी भी दी। उन क्षेत्रों में परिचालित किया जा रहे कुछ WhatsApp संदेशों के अनुसार, इन प्रोफेसरों ने यहां तक कहा कि अगर वे ग्रामीण नक्सली आतंकवादियों के आदेशों का पालन नहीं करते हैं, तो उनके घरों को जला दिया जाएगा!

क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि यह उसी भारत में हो रहा है जिस में आप रह रहे हैं? यह देश किस दिशा की ओर बढ़ रहा है, पता नहीं !?
और चलते चलते एक और महत्वपूर्ण बात पर ध्यान दें, उस रात जब वे ग्रामीण एक साथ इकट्ठा हो कर दरभा पुलिस स्टेशन से संपर्क कर अपनी शिकायत दर्ज करवा रहे थे, उसके ठीक अगली सुबह कॉमरेड कविता कृष्णन और उनकी माँ लक्ष्मी कृष्णन दोनों अपने फ्री सेक्स के अनुभवों के साथ 'नारीवादी स्वतंत्रता' का यह महान बयान जारी कर रही थीं कि यह हर औरत को करना चाहिए, और पूरे देश में ऐसा हंगामा मचा हुआ था कि लगभग हर समय फेसबुक और ट्विटर हैंडल या तो इनके बयान को कोसने या इसे समर्थन देने में व्यस्त था। लेकिन बड़ी बात यह है कि दोनों कॉमरेड मां-बेटी की जोड़ी ने बहुत ही चालाकी से और सफलतापूर्वक इस बड़े और ख़तरनाक प्रकरण को जोकि लगभग हर शैक्षणिक परिसर में प्रचलित वामपंथी बौद्धिक आतंकवाद का सबसे क्रूर और शैतानी चेहरा पूरी तरह से नग्न कर सकता था, दबा दिया और पूरे देश का ध्यान इस की तरफ़ से विचलित कर दिया। जागो हिन्दुस्तानियों, और देखो, इस विषैले 'लाल' रसायन की गंध कितनी ज़हरीली है!

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