'बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम' ने जीते युवा दिल, राख़ किए वामपंथी फिल्म आलोचकों के अरमान

18 May 16
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यह हम सभी के द्वारा जाना जाता एक स्थापित तथ्य है कि सौंदर्य की अभिव्यक्ति और बौद्धिक बहस की लगभग सभी धाराओं जैसे शिक्षा, पत्रकारिता, साहित्य, ललित कला, रंगमंच और सिनेमा आदि पर वामपंथियों द्वारा आजादी के बाद के दिनों से ही पूरी तरह कब्जा कर लिया गया. सिनेमा एक बहुत शक्तिशाली दृश्य-श्रव्य माध्यम है जो आम जनता और विशेष रूप से युवाओं को अत्यधिक तीक्ष्णता से प्रभावित करता है

और इसलिए यह दूसरे माध्यमों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है. भारतीय फिल्म उद्योग में वामपंथी शक्तियों का आतंक इस हद तक है कि दुनिया भर में वामपंथी शासन के क्रूर और अत्याचारी चेहरे तथा 'स्वतंत्रता' के लिए उनके पाखंड का कला सच उजागर करने के लिए अभी तक किसी भी भाषा में कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया है.

'बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम' भारत में बनी पहली फिल्म है जो सीधे-सीधे वाम के इस पाखंड पर हमला करती है और खुले में उनके विषैले सच को बाहर लाती है. फिल्म के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री, खुद भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) जोकि कुख्यात वामपंथी गढ़ जेएनयू के तत्वावधान में चलाने वाली संस्था है, के एक पूर्व छात्र रहे हैं और उन्होंने अपनी आँखों से वहां व्याप्त वामपंथी अंधेरे को करीब से देखा है. वे एक जाने-माने शिक्षाविद् के बेटे हैं, जो एक दौर में जबलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति थे. यह फिल्म वामपंथी शैक्षणिक संस्थानों और प्रोफेसरों, विदेशी धन से पोषित गैर सरकारी संगठनों और नक्सली आतंकवादियों के ख़तरनाक गठजोड़ को इतनी निर्ममता से नंगा करती है, कि वर्ष 2012 में ही पूरी कर लिए जाने के बावजूद इसे सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए सेंसर बोर्ड से मंजूर नहीं किया गया था. बहरहाल, विवेक तभी से इसे अनेकों अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रदर्शन के लिए ले जाने लगे, और मामी फिल्म महोत्सव में आधिकारिक चयन, जकार्ता फिल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फिल्म / निदेशक पुरस्कार, मैड्रिड फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ पटकथा पुरस्कार आदि ढेर सारे सम्मान खींचने में यह फ़िल्म कामयाब रही.

आख़िरकार, सेंसर बोर्ड ने अप्रैल 2016 में इस फ़िल्म को बिना किसी कट के मंजूरी दे दी. इस दौरान विवेक और उनकी टीम इस फ़िल्म को प्रख्यात शैक्षणिक संस्थानों जैसे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई, आईआईएमसी, एसपी जैन प्रबंधन अनुसंधान संस्थान, उस्मानिया विश्वविद्यालय, एनएएलएसएआर, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, हैदराबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, बीएचयू, पंजाब विश्वविद्यालय, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, पुणे विश्वविद्यालय, आईआईएससी बंगलौर और जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता आदि में निजी प्रदर्शन के लिए ले जाते रहे और वहां मौजूद छात्रों एवं शिक्षकों को दिखाते रहे.

कुछ एक कट्टर वामपंथी संस्थानों को छोड़कर जहां इस फ़िल्म को केवल एक घंटे पहले स्क्रीनिंग की अनुमति से इनकार कर दिया गया था और यहां तक ​​वामपंथी गुंडों द्वारा इसका हिंसक विरोध भी किया गया, बड़े पैमाने पर इस फ़िल्म को छात्रों की बड़ी संख्या से ज़बरदस्त उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया मिली.

'बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम' शुक्रवार 13 मई, 2016 को रिलीज़ हुई. एक दिलचस्प पहलू है कि इसकी रिलीज़ से पहले विवेक ने अरविंद केजरीवाल को एक खुला पत्र लिखा था और इस फ़िल्म को देखने के लिए आमंत्रित किया था. गौरतलब है कि जाने-माने 'फिल्म दीवाने' दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल के बारे में माना जाता है कि वे कोई भी फ़िल्म देखने में अत्यधिक रुचि रखते हैं तथा कभी-कभी तो रिलीज़ की तारीख पर ही नई फ़िल्म देख कर फिल्म की समीक्षा अपने ट्विटर प्रोफाइल के माध्यम से प्रचारित-प्रसारित करते हैं.

इस खुले पत्र में विवेक ने इस फिल्म ने ऐसे पन्द्रह कारण भी गिनाए थे जिनके चलते केजरीवाल को यह फ़िल्म अवश्य देखनी चाहिए थी. लेकिन, केजरीवाल जो आम तौर पर बेहद औसत दर्जे की बॉलीवुड फिल्में भी अवश्य देखते हैं और उनके बारे में ट्वीट भी करते हैं, इस फिल्म को देखने के लिए नहीं गए और अगर वह चला गया था, तो कम से कम इसका उल्लेख उन्होंने अपने ट्विटर पर साझा नहीं किया.

वामपंथी झुकाव के फिल्म आलोचकों के अधिकांश हिस्से ने फ़िल्म को ज़रा भी पसंद नहीं किया, जोकि काफी स्पष्ट और आशातीत था. सुनने में आया है कि उनमें से कुछ कथित तौर पर विवेक से उम्मीद कर रहे थे कि अपने  कॉलम में इस फ़िल्म के लिए एक अच्छी समीक्षा देने के बदले में उन्हें किसी 'नज़राना' का भुगतान करेंगे.

लेकिन इस फिल्म और इसकी टीम के लिए एक बहुत ही सुखद आश्चर्य से भरा अनुभव था कि जागरूक नागरिकों और युवावर्ग ने इस फ़िल्म को हाथों-हाथ लिया. इन लोगों ने काफी हद तक वामपंथी शैक्षिक और छात्र लॉबी द्वारा इस फ़िल्म तथा इसकी टीम के साथ किए गए दुर्व्यवहार और भेदभाव की वजह से इस के बारे में सुना था. सोशियल मीडिया नेटवर्किंग साइटों और IMDB.com, जो कि दुनिया भर में सिनेमा पर मौजूद सबसे प्रसिद्ध और विश्वसनीय ऑनलाइन संसाधन है, पर इन लोगों ने 'बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम' की ज़बर्दस्त और उत्साहवर्धक प्रशंसा की.

आप इस फ़िल्म के बारे में उन लोगों के रुख़ को जानने के लिए कुछ स्क्रीनशॉट यहीं देख सकते हैं. यह जानना दिलचस्प है कि उनमें से कुछ युवा उन्हीं संस्थानों के छात्र हैं जहां इस फ़िल्म को घोर वामपंथी भेदभाव और वैचारिक गुंडागर्दी का सामना करना पड़ा.

विशेष रूप से एक महिला दर्शक फ़िल्म से इतनी अधिक प्रभावित हुई, कि ठीक अपनी ट्विटर प्रोफाइल पर उसने 'बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम' की अगली कड़ी के बारे में पूछ डाला! वैसे, अगर इस फ़िल्म के लिए आम लोगों का यह प्रबल उत्साह 'जन-शक्ति' नहीं है, तो लगता है  कि 'जन-क्रांति' का नक़ाब ओढ़े प्रायोजित बौद्धिक आतंकवादी यह कभी नहीं समझ पाएंगे कि 'जन' शब्द का वास्तविक अर्थ होता क्या है!

हम ईमानदारी से उम्मीद करते हैं कि यह फ़िल्म अपने उद्देश्य में सफल होगी, और यह कामना रखते हैं कि 'बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम' हमारी वर्तमान और आगामी पीढ़ियों को प्रखर सत्य से रूबरू करवाने के लिए भारत में बनने वाली फिल्मों की एक नई श्रृंखला की शुरुआत है भर है, कई कई और नई फ़िल्मों की एक पहली कड़ी!

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