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रवींद्र नाथ टैगोर का 'अधिनायक' के लिये स्तुतिगान

09 Jul 15
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Published in Social

आइये राष्ट्रगान पे एक दृष्टि डालें ..

जन गण मन अधिनायक जय हे,

(हे जनता के तानाशाह,)
भारत-भाग्य-विधाता।
(आप भारत देश के भाग्य को रचने वाले विधाता हैं।)
पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा,
(उस भारत के जिसके पंजाब, सिंध, गुजरात, महाराष्ट्र,)
द्वाविड़, उत्कल, बंग।
(द्रविड़ - मद्रास -, उड़ीसा, और बंगाल जैसे प्रदेश हैं।)
विन्ध्य, हिमाचल, यमुना-गंगा,
(जिसके विन्ध्य तथा हिमालय जैसे पर्वत और यमुना-गंगा जैसी नदियाँ)
उच्छल जलधि तरंगा।
(जिनकी तरंगे उच्छृंकल होकर बहती हैं।)
तव शुभ नामे जागे,
(भोर में जागते ही आपका नाम लेते हैं,)
तव शुभ आशिष माँगे।
(और इस प्रकार आपका प्रातःस्मरण करके आपके आशीर्वाद की कामना करते हैं।)
जन-गण-मंगलदायक जय हे,
(हे जनता के मंगल करने वाले, आपकी जय हो,)
गाहे तव जयगाथा,
(वे सब आपका ही जयगान करते हैं,)
जन-गण-मंगलदायक जय हे,
(हे प्रजा के मंगलकारी महोदय,)
भारत भाग्य विधाता।
(आप ही भारत के भाग्य के विधाता हैं।)
जय हे, जय हे, जय हे,
(आपकी जय हो, जय हो, जय हो,)
जय, जय, जय, जय हे।
(जय, जय, जय, जय हो, अर्थात् सदा-सर्वदा जय होती रहे) 


ये 'जयगाथा' क्या कह रही है? आम जनता भारत को 'भारत माता' के रूप में देखती चली आ रही है, इसमें ये 'भारत भाग्य बिधाता' और 'अधिनायक' पुरुष क्यों है? अगर व भगवान को सम्बोधित है तो टैगोर का भगवान क्या केवल भारत का भाग्य-विधाता है?

ये गान 1911 में इंडियन नेशनल कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में सबसे पहले गाया गया था। एक दिन बाद ही गुलाम 'भारत के भाग्यविधाता' किंग जॉर्ज पंचम भारत आए थे। इसलिए कुछ लोग कहने लगे कि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे जॉर्ज पंचम के स्वागत में लिखा था। जॉर्ज पंचम के स्वागत में ही उसी साल मुंबई का गेटवे ऑफ इंडिया भी बनाया गया था। हालांकि बाद में टैगोर ने सफाई दी कि जॉर्ज पंचम की सेवा में लगे एक अधिकारी (जो गुरु टैगोर का मित्र भी था) ने उनसे इस तरह का स्वागत गीत लिखने को कहा था, लेकिन उनके लिखे गीत में भाग्य विधाता का अर्थ ईश्वर से है जो भारत के सामूहिक मानस का अधिनायक है और कोई भी जॉर्ज पंचम या षष्टम उसकी जगह नहीं ले सकता।  यह बात समझ में नहीं आती कि वह लोयाल्टी रेजोलुशन क्या था और अगर वह कॉंग्रेस का अधिवेशन था तो उसमें इम्पीरिअल मैजेस्टीज़ को होमेज पे करने वाला गाना बच्चों से क्यों गवाया गया? अगर ऐसा है तो फिर यह तो कॉंग्रेस की भी मंशा पर सवाल खड़ा करता है, जो कि सही भी है। सच्चाई तो यही है कि कॉंग्रेस आजादी की लड़ाई को गति देने नहीं मंथर करने के लिए ही पैदा हुई थी।

1911 के कांग्रेस के मॉडरेट नेता चाहते थे कि सम्राट दम्पती की विरुदावली कांग्रेस मंच से उच्चारित हो। उन्होने इस आशय की रवीन्द्रनाथ से प्रार्थना भी की थी। कांग्रेस का अधिवेशन ‘जनगणमन’ गान से हुआ और बाद में सम्राट दम्पती के स्वागत का प्रस्ताव पारित हुआ। प्रस्ताव पास हो जाने के बाद एक हिन्दी गान बंगाली बालक बालिकाओं ने गाया था, यही गान सम्राट की स्तुति में था। सन १९११ के २८ दिसम्बर के ‘बंगाली’ में कांग्रेस अधिवेशन की रिपोर्ट इस प्रकार छपी थी—

"The proceedings commnenced witha patriotic song composed by Babu Rabindranath Tagore, the leading poet of Bengal (Janaganamana..) of which we give the English translation (यहाँ अँग्रेज़ी में इस गान का अनुवाद दिया गया था) Then after passing of the loyalty resolution, a Hindi song paying heartfelt homage to their imperial majesties was sung by Bengali boys and girls in chorus."

जहाँ तक यह कहना कि अंगरेजी अखबारों को कविता समझ में नही आयी, ये भी समझ के परे है। अंग्रेजों ने 'वन्दे मातरम' सहित हजारों गीतों, कविताओं को प्रतिबन्धित किया। कितनी सारी पुस्तकों को प्रतिबंधित किया। ऐसे में कैसे मान लिया जाय कि उनको यह गान समझ में नहीं आया? सबसे बड़ा साक्ष्य तो समय और मौके का साक्ष्य है।

यह कि यह गीत 27 दिसंबर 1911 को कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था। कांग्रेस तब अंग्रेजों के प्रति वफादार होती थी। उस अधिवेशन का घोषित एजेण्डा जॉर्ज पंचम का स्वागत था। 
वैसे गुरुदेव का कहना था कि उन्होंने यह गीत ईश्वर की स्तुति में लिखा था और कांग्रेसियों द्वारा अनुरोध पर उस अधिवेशन में गाने के लिए दे दिया। कहीं गुरुदेव ने एक तीर से दो शिकार तो नहीं किए??

 

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