अटाली, फरीदाबाद, (हरियाणा ) संभवतः ५०० वर्ष पुराना गाँव है जिसमें आज सभी धर्म -संप्रदाय के लोग रहते हैं । अभी यह गाँव दंगो के कारण सुर्ख़ियों में है। क्या है इसका पूरा सच ?


आज से कोई पच्चीस साल पहले, गाँव के सरपंच ने दो मुसलमान परिवार को गाँव में रहने का स्थान दिया और उन्हें फूलने फलने का अवसार प्रदान किया। उसने सोचा था उस परिवार के कामगार खेतों में उसके काम आयेंगे।   रहने के लिए उन्हें गाँव की सार्वजनिक पंचायती भूमि दे दी (सरपंच को इसका अधिकार नहीं था लकिन किसी ने विरोध नहीं किया)।

कुछ ही सालों में वो दो से बढ़ कर १५ परिवार हो गए।  इसके पश्चात उन्होंने सरपंच से मुर्दे गाड़ने के लिए भूमि की याचना की । सरपंच ने उन्हें गाँव के एक धार्मिक स्थल के समीप कब्रगाह के अनुमति दे दी जिसका कुछ लोगों ने विरोध किया, ऐसे में सरपंच ने पंचायती जमीन का एक बड़ा भूभाग उन्हें दान कर दिया (जिसका उसे अधिकार नहीं था, लेकिन इस बार भी किसी ने विरोध नहीं किया)। 
अब हुआ ये की धार्मिक स्थल के पास वाली भूमि जो अभी भी खाली थी, उसे ये मुसलमान परिवार अपने नमाज़ आदि धार्मिक उपक्रमों के लिए प्रयोग करने लगे, इसके लिए उन्होंने किसी से आज्ञा लेने की आवश्यकता नहीं समझी। गाँव वालों ने कहा की कृपया ऐसा न करें हम आपको दूसरी भूमि दे देंगे आप यहाँ अपने धार्मिक उपक्रम की भीड़ न लगायें । इसपे मुसलामानों ने कहा की वो बस ऐसे ही नमाज़ की अस्थायी व्यवस्था है , बस चादर-दरी आदि है वहाँ कभी कोई स्थायी निर्माण कार्य नहीं होगा ...बात आई गयी हो गयी ।
हिन्दू नहीं चाहते की उनके मंदिर के आस पास मुसलमानों के धार्मिक स्थल हो  - व्यावहारिकता के आधार पे यह देखा गया है की ऐसे स्थलों पे हिन्दुओं का, ख़ास कर स्त्रियों आदि का आना जाना दूभर हो जाता है।  फिर जब नयी भूमि दी जा रही थी तो मुसलमानों का यह कैसा हठ ?

समय बीतता गया और वो परिवार १५ से ५० हो गए, धीरे धीरे उस नमाज़ स्थल पे  टीन के चदरों से एक तम्बुनुमा ढांचा बना दिया गया। जब गाँव वालों ने रोष प्रकट किया तो कहा गया ये तो बस गर्मी से बचाव के लिए अस्थायी प्रयोजन है
गाँव वालों ने भांप लिया की बात बढती जा रही है अतः उन्होंने निवेदन किया की आपको हम एक उत्तम भूमि देते हैं जहां आप अपने इच्छानुसार मस्जिद बना के यथोचित धार्मिक उपक्रम एवं नमाज़ इत्यादि करें।  यहाँ तक की गाँव वालों ने उस मस्जिद लिए स्वयं धन की व्यवस्था भी की  
मुसलामानों ने मस्जिद के लिए प्रदान की गयी भूमि का अधिग्रहण तो किया लेकिन उस भूमि पे  मस्जिद के लिए दिए गए धन से अपने लिए नए मकान बना लिए और पुरानी नमाज़ वाली जगह जस के तस रह गयी।
कुछ 4-5 सालों बाद गाँव वालों ने दुबारा वही किया - नयी भूमि प्रदान की और मस्जिद के लिए धन भी जुटाया, और पुनः वही सब कुछ हुआ। नए मकान बना लिए गए, हिन्दुओं के धार्मिक स्थल के पास नमाज़ आदि चलता रहा ।
इधार मुसलमान आबादी में बढ़ के 200 से अधिक परिवार हो गए  तथा गाँव के पंचायत चुनावों में एक वोट बैंक बन गए । अब तो उनकी चांदी हो गयी क्योंकि गाँव के सभी नेता उन्हें भाँती भाँती के प्रलोभन एवं वादे देने लगे।  
आज जो हुआ है वो कोई नया नहीं है ।। पिछले 5 सालों में गाँव में कई बार छोटे दंगे एवं झड़प हो चुके हैं। कई बार धरा 144 लागू की जा चुकी है।  
इस बार तो प्रकृति ने भी ऐसी कृपा की की मार्च -अप्रैल के ओलावृष्टि में सभी फसलें नष्ट हो गयी।

समय के साथ मुसलामानों ने गाँव में अपने नमाज स्थल पे आखिरकार एक बड़ी मस्जिद का निर्माण प्रारंभ कर ही दिया। गाँव में जो सरपंच था उसकी कार्यावधि समाप्त होने को थी लेकिन उसने गाँव में बिना किसी से विमर्श के मुसलमान समुदाय को चिट्ठी लिख के दे दी की उनके मस्जिद बनाने से गाँव में किसी को आपत्ति नहीं है।
5 साल पहले मामला स्थानीय कोर्ट मे गया । कोर्ट ने इस पर स्टे दे दिया ।

जब मुसलमान उस जगह जबरदस्ती मस्जिद का निर्माण करने लगे तब गांव वालों ने इसका विरोध किया । इस पर एकत्रित मुसलमानों की भीड नें गाँव वालों पे आक्रमण कर दिया; इस बात से क्रोधित हिन्दुओं ने उसी प्रकार प्रतिकार किया । झगडे में दोनों पक्षों के घरों, दुकानों को क्षति हुयी है; मुसलमान ने स्वयं को पीडित एवं असहाय दिखाने के लिये पुलिस स्टेशन में शरण ले लिया है। यदि इन्हें 'बहुंख्यक' हिन्दुओं से इतना ही भय है तब मन्दिर को नुकसान पहुंचाने की ढिठाई कैसे की गई ? झड़प में कुछ मनचलों ने मंदिर की छत तोड़ दी एवं मंदिर में उपद्रव किया, प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई जिससे वो झड़प ने बढ़ कर दंगों का रूप ले लिया ।

इतने सालों से चलती आ रहे घटनाक्रम से गाँव वालों का संयम टूट गया और इस बार निर्माणाधीन मस्जिद में गाँव वालों ने आग लगा दी जिससे निर्माण कार्य में युक्त कुछ बांस के लट्ठे जल गए और पूरी मिडिया में यह खबर आ गयी की हिन्दुओं ने मुसलामानों पे अत्याचार किया है। वैसे तो झड़प में दोनों ओर क्षति हुई है - दोनों पक्ष के लोग अस्पताल में घायलावस्था में पड़े हैं , कुछ तो आपात सेवा गृह में जूझ रहे हैं लेकिन देखने वाली बात ये है की मुसलमान परिवारों को पूरे देश एवं समुदाय से सहायता मिल रही है।असदुद्दीन ओवैसी ने वहाँ पहुँच के न केवल आर्थिक सहायता प्रदान की बल्कि मस्जिद वहीँ बनेगी की घोषणा कर दी।


वहीँ दूसरी और, गरीब हिन्दू परिवार पेट काट कर एक ओर अस्पताल के खर्चे वहन कर रहे हैं और दूसरी और पुलिस की यातनाएं झेल रहे हैं ।
क्योंकि ये एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है जिसका अर्थ ये है की हर दंगे का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व हिन्दू समाज पे आता है। उनसे मिलने कोई सांसद तो दूर, कोई छुटभैय्या नेता तक नहीं आया। उनका भविष्य एक प्रश्नचिन्ह है और जिस प्रकार की राजनीती चल रही है उससे स्पष्ट है की न केवल वहन मस्जिद बनेगी अपितु मुसलमान परिवारों का पुनर्वासन भी करवाया जायेगा। हो सकता है राज्य एवं केंद्र सरकार उनका हाल समाचार पूछने एक प्रतिनिधिमंडल भी भेज दे, कुछ और धन के साथ, क्योंकि विश्व को ये भी तो दिखाना है की मोदी एवं भाजपा मुसलमान विरोधी नहीं है ।।